31.5.24

M-118 क्यों डरता हूँ

क्यों डरता हूँ मैं तुम्हे खोने से,
जबकि तुम्हे मैंने पाया ही कहाँ है?
तुम क्या जानो विरह की पीड़ा,
तुमने अभी मुझे खोया ही कहाँ है?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-118

29.5.24

Q-204 और क्या सौगात

और क्या सौगात देगा वो मुझे,
दर्द जो दिया है वो कम नहीं है।
बहुत याद रख लिया मैंने उसे,
और याद रखने का दम नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-204










26.5.24

Q-055 आज जो मुझे

आज जो मुझे मुस्कुराते देख लिया,
बस इसी बात से नाराज़ है ज़िन्दगी।
कितनी ख्वाहिशों को मैंने दबा दिया,
पर फिर भी मुझसे नाराज़ है ज़िन्दगी।   

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-055

Q-203 ख़ुदा की नियामत

खुदा की नियामत हैं, इनको बोझ न समझो,
बड़ी मेहनत का फल हैं इन्हें बोझ न समझो,
छुपा कर रखो इन बेशकीमती अमानतों को,
नुमाइश करने का इनको सामान न समझो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-203

24.5.24

Q-202 ख़ुदा सुंदर नहीं

ख़ुदा सुंदर नहीं बनाता किसी को,
ये तो उसके चाहने वाले बना देते हैं।
कोई इंसाँन हो मामूली चाहे जितना,
अहम तो उसको मुरीद बना देते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-202

Q-201 मेरे 'अपने' हर हाल में

 मेरे 'अपने' हर हाल में, मेरे हाल जान लेते हैं।
मेरी मुस्कुराहट में भी मेरा दर्द पहचान लेते हैं।
बात को कितना भी घुमाफिरा कर पेश कर दूँ,
वो ज़हीन जो ठहरे सही मतलब जान लेते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-201

Q-200 अपने दर्द ज़माने से

अपने दर्द ज़माने से छुपाकर, मै घूमता रहा,
ग़म भुलाने की माकूल सी जगह ढूंढता रहा,
दीखती रही ख़ुशी मेरे जिस चेहरे पर तुम्हे,
वो था मुखौटा, जिसे ओढ़कर मै घूमता रहा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-200

M-117 नालायक संतानों

नालायक संतानों से बेहतर एक बेजान छड़ी है,
समय पर सहारा बनके सदैव हो जाती खड़ी है,
संभाल लेती है उपेक्षित लड़खड़ाते उन माँ-बापों को,
जिनकी संतानों नाती पोतों को कुछ नहीं पड़ी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-117

M-116 काश, ये सीमाएं

काश, ये सीमाएं न हुआ करतीं,
न मै बंधता, न तुम बंधा करतीं,
राहों में आये किसी मोड़ पर भी,
न मै मुड़ता, न तुम मुड़ा करतीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-116

M-115 अश्रुओं को तुम न रोको

अश्रुओं को तुम ना रोको,
ये ग़मों की निशानियाँ हैं।
इन्हें बहने देना ही अच्छा,
ये बीत चुकी कहानियां हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-115

M-114 पवन पैग़ाम

पवन पैगाम पहुंचाए पल-पल,
प्यारे परदेसी प्रियतम तलक।
मै मंत्र-मुग्ध मुस्काऊँ मंदमंद,
मनमीत का मंगल आने तलक।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-114

M-113 'अजनबी' जब लगने लगे

'अजनबी' जब लगने लगे अपना सा,
अपरिचित हो जाए चिरपरिचित सा,
अन्जाना हो जाए जाना पहचाना सा,
यहीं से प्रारम्भ एक प्रेम-फ़साना सा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-113

M-112 यह किसके स्वर मुझ तक

यह किसके स्वर मुझ तलक पहुँच रहे हैं,
चुपके से मेरे ह्रदय पटल पर उतर रहे हैं,
अरे नहीं! भला वो क्यों पुकारेगी मुझको,
कल्पनाओं में, ये तो मेरे कान बज रहे हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-112

M-111 सीमाओं ने मुझको भ्रमित

सीमाओं ने मुझको भ्रमित कर दिया,
परिभाषाओं में ही सीमित कर दिया,
मै उड़ान भर चुका था आकाश की ओर,
पर किसी ने पंखों को सीमित कर दिया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-111

M-110 न भविष्य हूँ मै,

न भविष्य हूँ मै, ना हूँ मै वर्तमान तुम्हारा,
जाने क्यूं फिर भी रहता है ध्यान तुम्हारा,
सभी हसरतें निकल गईँ दिल से अब,
निकलता नहीं तो बस अरमान तुम्हारा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-110

M-109 कभी छोड़ देता हूँ

कभी छोड़ देता हूँ मै वक्त को,
कभी वक्त भी मुझे छोड़ देता है।
साथ चल नहीं पाए हम दोनों,
ख़ुदा भी रुख हमारे मोड़ देता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-109

M-108 खुद भी देहरूपी

ख़ुद भी देहरूपी ईमारत को दुश्मन के हमले से बचा,
खुद भी कर संरक्षित उसे, कामाग्नि के हमले से बचा,
धारण करके चल देह पर उपयुक्त कवच, ऐ नारी तू,
सामने से आने वाले हर वार को स्वयं के दम से बचा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-108

M-107 कोई ऐसा सुंदर

कोई ऐसा सुंदर सहज रास्ता मुझे बतलाऐं,

मै दाना डालूँ कौव्वे कांव कांव करते आएं,

गर दाना पानी न भी हो कभी हाथ में मेरे,

मै जहाँ चाहूँ एक आवाज़ पे मेरी चले आएं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-107

 

M-106 ऐ दर्द तू कभी

ऐ दर्द तू कभी भी आना,
मगर दबे पाँव न आना,
मेरा दिल बड़ा कमज़ोर है,
हो सके तो बता कर आना।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-106

M-105 माना अधिक ज्वलंत

माना अधिक ज्वलंत है तेरी तृष्णा,
पर इतनी अधीर न हो, नव-यौवना,
धरती की प्यास न बुझी, न बुझेगी,
बेचारा सावन बरस ले चाहे जितना।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-105

M-104 तू तो तेज़-तेज़

तू तो तेज़-तेज़ चलती जा रही है,
मुझसे आगे निकलती जा रही है,
तू मेरी है, मेरा साथ दे ऐ ज़िंदगी,
क्यों हाथ से फिसलती जा रही है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-104

M-103 सभी कुछ है मेरे पास

सभी कुछ है मेरे पास, परंतु कुछ भी नहीं है,
इस जीवन में यदि माँ, तेरी उपस्थिति नहीं है.
कभी कभी दिल करता है बच्चा बन जाऊँ मैं,
पर संभव नहीं माँ, दुनियां में अब तू ही नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-103

M-102 बात बात में बातें

बात-बात में बातें बहुत कर लीं ज़माने की,
अब ज़रा कुछ बातें अपनी भी तो कर लूं।
मुंह फेर कर खड़ा रहूंगा कब तलक मैं,
रुख आईने की तरफ़ ज़रा मैं भी तो कर लूं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-102

M- 101 कल्पनिकताएँ आज

काल्पनिकताएं आज वास्तविकताएं बन गईं हैं
और वास्तविकताएँ काल्पनिकताएं बन गईं हैं।
परिवर्तनों को देखके हम बहुत दुविधाओं में हैं,
निर्लज्जताएं भी कैसे आधुनिकताएं बन गईं हैं।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी"-101

M-100 इतनी मुफ्त सलाह

इतनी मुफ्त सलाह-मशविरे रोज़ मुझे मिल जाते हैं,
सोचता हूँ जहाँ में इंसानियत भाईचारा अभी बाकी है।
हर दिन सुबह-सुबह सोचकर फिक्र में मै पड़ जाता हूँ,
सारी दुनियां सुधर चुकी, बस मेरा ही सुधरना बाकी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-100

M-099 मेरे पास खुशियां ही

मेरे पास ख़ुशियां ही ख़ुशियां शेष थीं,
हर्ज नहीं जो उनमे से कुछ आप ले गए।
मेरे पास दर्द भी हैं जो न दूंगा किसी को,
क्योंकि वो सौगात हैं जो आप दे गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-099

M-098 प्रेम एक सौगात है

प्रेम एक सौगात है अधिकार नहीं है,
भावों का संचार है , व्यवहार नहीं है,
समर्पण ही है इसकी अभिव्यक्ति,
जो व्यक्त हो जाय , वो प्यार नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-098

Q-199 पुराने ज़ख़्म अब बे-असर

पुराने ज़ख्म अब बे-असर हो गए हैं,
हम भी अब इनके ख़ूगर  हो गए हैं,
हम न करेंगे अब इनकी कोई दवा,
अब तो ये हमारे हमसफ़र हो गए हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-199

23.5.24

Q-198 बैठे रहते थे

बैठे रहते थे बज़्म में लोग, जिनके बहाने से,
बेनूर होगई महफिलें, अब उनके न आने से,
कोई तो मना लाए उन्हें, उजड़ी महफ़िल में,
हमने देखी नहीं रौनक यहाँ, एक ज़माने से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-198

Q-197 तुम्हारी ज़ुल्फों में

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में अगर ये छल्ले न होते,
हमारे दिल में मुहब्बत के ये हल्ले न होते,
हम भी होते किसी नेक काम में मसरूफ़,
शेरो-शायरी में मुब्तला यूं निठल्ले न होते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-197

Q-196 जबसे हम उनकी दीद

जबसे हम उनकी दीद के तलबगार हो गए,
वो किसी ख़ुशफ़हमी के शिकार हो गए,
हमने ग़लती से ज़रासा क्या चाह लिया उन्हें,
वो समझे वो हुस्न वालों में शुमार हो गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-196

Q-195 हक़ीक़त में, जो

हकीकत में, जो न कभी मिलते हैं,
मुहब्बत में जो न कभी पिंघलते हैं,
सपनों में वो लग जाते हैं सीने से,
इसीलिए ख़्वाबों को मन मचलते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-195

Q-194 सदियां बीत गईँ,

सदियाँ बीत गईं, तुझे मगर भूला नहीं हूँ मै,
वो बातें, समां, हसीं मंज़र, भूला नहीं हूँ मै,
अपनी ज़िद में तूने किनारा कर लिया मुझसे,
पर तेरा वो जोशे-ए-मुहब्बत भूला नहीं हूँ मै।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-194

Q-इस दुनियां से मुंह

इस दुनियां से मुंह मोड़ सकता हूँ,
जन्नत की मन्नत छोड़ सकता हूँ,
जुड़ गया है जो मुझसे तेरा रिश्ता,
उसको भला मैं कैसे तोड़ सकता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-193

Q-192 मिल गया पैग़ाम

मिल गया पैग़ाम उसका, जो उसने मुझे भेजा भी नहीं,
पढ़ लिया मैंने वो सभी, जो उसने मुझे लिखा भी नहीं,
कौन सा है यह सिलसिला, मेरे और उसके दरमियान,
कभी किसी ने जो सुना नहीं, किसी ने देखा भी नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-192

Q-191 रहता था जो

रहता था जो ख़्याल सा मेरे साथ-साथ,
वो आज मुझ से यूं बचा-बचा सा क्यूँ है।
तन्हा-तन्हा सा बहुत हो गया हूँ मै आज,
जुड़ा-जुड़ा सा रिश्ता, कटा-कटा सा क्यूँ है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-191

Q-190 ज़िन्दगी कहाँ ले जाएगी

ज़िन्दगी कहाँ ले जायगी, हमें मालूम नहीं,
अँधेरे छटेंगे कि बढ़ेंगे, यह भी इलम नहीं,
हम तो चल पड़ें हैं ज़िन्दगी के पीछे-पीछे,
हमे फ़र्क नहीं गर सुबह नहीं या शाम नहीं।
 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-190

Q-189 अब, जब मैं और तुम

अब, जब मै और तुम दोस्त रहे नहीं,
गिले-शिकवे तुमसे हमे कोई रहे नहीं,
तो अब मेरे ग़मज़दा शेरों पर न जाना,
ये औरों के लिए हैं, तुम्हारे लिऐ रहे नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-189

Q-188 अपनी ही सोच पर

अपनी ही सोच पर मै शर्मिंदा होता रहा,
क्यों ख़ुद को दोस्त मैं तेरा समझता रहा,
क्यूं करता रहा बे-पनाह मुहब्बत तुझसे,
जफ़ा को भी तेरी, मै वफ़ा समझता रहा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-188

Q-187 ना घटने के डर

ना घटने का डर, ना लुटने का डर,
न ज़रूरत वारिस की न तालों की।
नींद आती है, सकून की हर रोज़,
यही है दौलत बिन दौलत वालों की।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-187

Q-186 अपनी ज़िंदगी मे जीत कम

अपनी ज़िन्दगी में जीत कम, हार बहुत है,
हम क्या करें,  हमको तुमसे प्यार बहुत है,
आओ ठंडे रिश्तों को ज़रा देदें गर्मजोशी,
हमे एहसासो-जज़्बात का बुख़ार बहुत है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-186

Q-185 आंसू न समझो इन्हें

आंसू न समझो इन्हें, आँखों से जो निकल रहें हैं,
बरसों पुराने ग़म हैं, जो अब जाके निकल रहें हैं.
कब तक सम्भालूँ इनको अपनी बेगुनाह आँखों में,
जिन्होंने दिए थे, ज़िन्दगी से अब वो निकल रहें हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-185

Q-184 पता नहीं मेरे गमों

पता नहीं मेरे ग़मों को ये कैसी आदत है,
मुझसे चिपट जाते हैं तन्हा देख के मुझे।
बेचारी तन्हाई मेरी लाचार हो जाती है,
जब सताते हैं ग़म इस तराह घेर के मुझे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-184

Q-183 छोड़ो भी तस्करा

छोड़ो भी तस्करा-ऐ-बेवफ़ाई, बहुत हो गया,
ख़ामोश हो चुका वो इतना, कि बुत हो गया,
रौशन कर दी थी जिसने ज़िन्दगी किसी की,
ख़ुद उसी की ज़िन्दगी में अँधेरा गुप हो गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-183

Q-182 मुकम्मल हो जाए

मुकम्मल हो जाये ग़मगीन ग़ज़ल,
चोट कोई आज ताज़ा पहुँचाओ मुझे।
मेरी आँखों में रूके आंसू छलक जाएँ,
दर्द आज कोई ऐसा पहुँचाओ मुझे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-182

Q-181 मेरी सुबह है तुझसे

मेरी सुबाह है तुझसे, मेरी रात तुझसे,
तुझे कैसे खो दूं मैं, मेरी हयात तुझसे,
तुझे कैसे भुलाऊँ, मेरे ख़्वाब तुझसे,
तू ही मेरा साज़, इसमें आवाज़ तुझसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-181

Q-180 गीत लिखूं न लिखूं

गीत लिखूँ न लिखूँ, मगर कोई गीत गुनगुना तो सकता हूँ,
पा सकूं, या न पा सकूं किसी को, पर उसे चाह तो सकता हूँ,
माना के यहाँ हस्बे-आरज़ू कुछ नहीं मिलता हर किसी को,
कोई ख़्वाब मुकम्मल जहाँ का दिल में सजा तो सकता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-180

Q-178 ज़ुबान की हिफ़ाज़त

ज़ुबान की हिफ़ाज़त करता हूँ, कहीं फिसल न जाय,
दिल काबू में रखता हूँ, हाथ से कहीं निकल न जाय,
ख़ुदा की बक्षी हुई बड़ी नेमत है ज़िन्दगी "अजनबी",
डरता हूँ मकसद इसका ख़ाक में कहीं मिल न जाय।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-178

Q-177 बुझे चराग़ का धुआं

 बुझे चराग़ का यह धुआं बता रहा है,
अभी अभी ख़त्म हुई है दास्ताँ कोई,
तन्हाई में लिपटा सन्नाटा जता रहा है,
अभी अभी यहाँ से गुज़रा है तूफ़ां कोई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-177

Q-176 मैं कुछ अलैहदा

मैं कुछ अलैहदा हूँ इस ज़माने से,
पसीजता नहीं किसी के मनाने से,
मैं आइना हूँ, ढुलमुल इंसान नहीं,
बाज़ न आऊंगा सच्चाई बताने से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-176

Q- तुझे अगर मुझसे

तुझे अगर मुझसे मुहब्बत नहीं,
तो बता जुदा होके रोया क्यों था।
सींचना नहीं था इस पौधे को,
तो भला तूने उसे बोया क्यों था।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-175

Q-174 ख़ामोशी खामोशी

ख़ामोशी ख़ामोशी है पर बहरी नहीं है,
रात बहुत अंधेरी है,  पर ठहरी नहीं है,
तुम्हारी ज़रा सी मुहब्बत ही बहुत है,
ग़म नहीं है मुझे वो अगर गहरी नहीं है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-174

Q-173 न रहे हम अपनों में

न रहे हम अपनों में, न रहे बेगानों में,
उम्र गुज़री इम्तिहानों ही इम्तिहानों में,
तनहाइयाँ ही हैं हमसफ़र अब अपनी,
भीड़ में हो कर भी रहे हम वीरानों में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-173

Q- शायद फिर बहार

शायद फिर बहार शहर में आने लगी है,
फिर उनकी महक घर में आने लगी है,
जबसे सुन ली है उनके आने की आहट,
फिर एक ग़ज़ल ज़हन में आने लगी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-172

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...