आंसू न समझो इन्हें, आँखों से जो निकल रहें हैं,
बरसों पुराने ग़म हैं, जो अब जाके निकल रहें हैं.
कब तक सम्भालूँ इनको अपनी बेगुनाह आँखों में,
जिन्होंने दिए थे, ज़िन्दगी से अब वो निकल रहें हैं।
बरसों पुराने ग़म हैं, जो अब जाके निकल रहें हैं.
कब तक सम्भालूँ इनको अपनी बेगुनाह आँखों में,
जिन्होंने दिए थे, ज़िन्दगी से अब वो निकल रहें हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-185
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