18.2.23

S-233 कोई शिकायत

कोई शिकायत न रही ज़माने से।
जब से रु-ब-रु हुए हैं  आयने से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-233

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...