सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में,
चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में।
चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में।
पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ,
मौसम बदल कर 'सूखा' कर दूं, सावन में।
नदियों झरनों सरोवरों को दूषित कर डालूं
प्रदूषण का ज़हर फैला दूँ सारे आलम में।
मैं कुदरत के स्रोतों का संतुलन बिगाड़ दूँ,
परवाह न करूँ भविष्य की अपने आनंद में।
मै प्रकृति का शत्रु स्वार्थी इंसान जो ठहरा,
प्रकृति को बांधना चाहूँ अपने ही बंधन में।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-007
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