31.5.24

M-118 क्यों डरता हूँ

क्यों डरता हूँ मैं तुम्हे खोने से,
जबकि तुम्हे मैंने पाया ही कहाँ है?
तुम क्या जानो विरह की पीड़ा,
तुमने अभी मुझे खोया ही कहाँ है?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-118

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...