23.5.24

Q-177 बुझे चराग़ का धुआं

 बुझे चराग़ का यह धुआं बता रहा है,
अभी अभी ख़त्म हुई है दास्ताँ कोई,
तन्हाई में लिपटा सन्नाटा जता रहा है,
अभी अभी यहाँ से गुज़रा है तूफ़ां कोई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-177

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...