चार दिन में ही वापस आ धमके मेरे तमाम ग़म,
बड़ा शौक सा चरमराया था मुझे ख़ुश रहने का।
बड़ा शौक सा चरमराया था मुझे ख़ुश रहने का।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-276
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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