जब कभी वास्ते ख़तम होते हैं।
बीच में फ़ासले आरम्भ होते हैं।
बीच में फ़ासले आरम्भ होते हैं।
मंज़िलें नहीं होतीं मुश्किल,
पहुंचने के रास्ते कम होते हैं।
ग़मों में भी हो चुकी है कशिश,
आगे आगे ग़म, पीछे हम होते हैं।
ख़ुद को ख़ुद ही संभालो यारों,
ये ज़लज़ले कहाँ कम होते हैं।
रहो उठाते कितनी भी आवाज़,
रोज़मर्रा ही नए सितम होते हैं।
दवाए-ज़ख्म न ढूँढ़ "अजनबी"
अब नए ज़ख्म ही मरहम होते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-008
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