पता नहीं मेरे ग़मों को ये कैसी आदत है,
मुझसे चिपट जाते हैं तन्हा देख के मुझे।
बेचारी तन्हाई मेरी लाचार हो जाती है,
जब सताते हैं ग़म इस तराह घेर के मुझे।
मुझसे चिपट जाते हैं तन्हा देख के मुझे।
बेचारी तन्हाई मेरी लाचार हो जाती है,
जब सताते हैं ग़म इस तराह घेर के मुझे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-184
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