काश, ये सीमाएं न हुआ करतीं,
न मै बंधता, न तुम बंधा करतीं,
राहों में आये किसी मोड़ पर भी,
न मै मुड़ता, न तुम मुड़ा करतीं।
न मै बंधता, न तुम बंधा करतीं,
राहों में आये किसी मोड़ पर भी,
न मै मुड़ता, न तुम मुड़ा करतीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-116
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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