नालायक संतानों से बेहतर एक बेजान छड़ी है,
समय पर सहारा बनके सदैव हो जाती खड़ी है,
संभाल लेती है उपेक्षित लड़खड़ाते उन माँ-बापों को,
जिनकी संतानों नाती पोतों को कुछ नहीं पड़ी है।
समय पर सहारा बनके सदैव हो जाती खड़ी है,
संभाल लेती है उपेक्षित लड़खड़ाते उन माँ-बापों को,
जिनकी संतानों नाती पोतों को कुछ नहीं पड़ी है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-117
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