तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में अगर ये छल्ले न होते,
हमारे दिल में मुहब्बत के ये हल्ले न होते,
हम भी होते किसी नेक काम में मसरूफ़,
शेरो-शायरी में मुब्तला यूं निठल्ले न होते।
हमारे दिल में मुहब्बत के ये हल्ले न होते,
हम भी होते किसी नेक काम में मसरूफ़,
शेरो-शायरी में मुब्तला यूं निठल्ले न होते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-197
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