23.5.24

Q-182 मुकम्मल हो जाए

मुकम्मल हो जाये ग़मगीन ग़ज़ल,
चोट कोई आज ताज़ा पहुँचाओ मुझे।
मेरी आँखों में रूके आंसू छलक जाएँ,
दर्द आज कोई ऐसा पहुँचाओ मुझे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-182

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