मुकम्मल हो जाये ग़मगीन ग़ज़ल,
चोट कोई आज ताज़ा पहुँचाओ मुझे।
मेरी आँखों में रूके आंसू छलक जाएँ,
दर्द आज कोई ऐसा पहुँचाओ मुझे।
चोट कोई आज ताज़ा पहुँचाओ मुझे।
मेरी आँखों में रूके आंसू छलक जाएँ,
दर्द आज कोई ऐसा पहुँचाओ मुझे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-182
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