23.5.24

Q-181 मेरी सुबह है तुझसे

मेरी सुबाह है तुझसे, मेरी रात तुझसे,
तुझे कैसे खो दूं मैं, मेरी हयात तुझसे,
तुझे कैसे भुलाऊँ, मेरे ख़्वाब तुझसे,
तू ही मेरा साज़, इसमें आवाज़ तुझसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-181

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...