गीत लिखूँ न लिखूँ, मगर कोई गीत गुनगुना तो सकता हूँ,
पा सकूं, या न पा सकूं किसी को, पर उसे चाह तो सकता हूँ,
माना के यहाँ हस्बे-आरज़ू कुछ नहीं मिलता हर किसी को,
कोई ख़्वाब मुकम्मल जहाँ का दिल में सजा तो सकता हूँ।
पा सकूं, या न पा सकूं किसी को, पर उसे चाह तो सकता हूँ,
माना के यहाँ हस्बे-आरज़ू कुछ नहीं मिलता हर किसी को,
कोई ख़्वाब मुकम्मल जहाँ का दिल में सजा तो सकता हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-180
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