न रहे हम अपनों में, न रहे बेगानों में,
उम्र गुज़री इम्तिहानों ही इम्तिहानों में,
तनहाइयाँ ही हैं हमसफ़र अब अपनी,
भीड़ में हो कर भी रहे हम वीरानों में।
उम्र गुज़री इम्तिहानों ही इम्तिहानों में,
तनहाइयाँ ही हैं हमसफ़र अब अपनी,
भीड़ में हो कर भी रहे हम वीरानों में।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-173
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