रहता था जो ख़्याल सा मेरे साथ-साथ,
वो आज मुझ से यूं बचा-बचा सा क्यूँ है।
तन्हा-तन्हा सा बहुत हो गया हूँ मै आज,
जुड़ा-जुड़ा सा रिश्ता, कटा-कटा सा क्यूँ है।
वो आज मुझ से यूं बचा-बचा सा क्यूँ है।
तन्हा-तन्हा सा बहुत हो गया हूँ मै आज,
जुड़ा-जुड़ा सा रिश्ता, कटा-कटा सा क्यूँ है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-191
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