अपनी ही सोच पर मै शर्मिंदा होता रहा,
क्यों ख़ुद को दोस्त मैं तेरा समझता रहा,
क्यूं करता रहा बे-पनाह मुहब्बत तुझसे,
जफ़ा को भी तेरी, मै वफ़ा समझता रहा।
क्यों ख़ुद को दोस्त मैं तेरा समझता रहा,
क्यूं करता रहा बे-पनाह मुहब्बत तुझसे,
जफ़ा को भी तेरी, मै वफ़ा समझता रहा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-188
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