उसे पढ़ना मुश्किल है, जाने वो ख़ुदी में है कि बेख़ुदी में है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी S-061
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
रंजो- ग़म लेकर दिल खिल नहीं सकता,
गर फट जाए दिल, तो सिल नह सकता,
पत्थर में धड़कन भरने से दिल बनते नहीं,
दूकानों से कोई दिल मिल नहीं सकता।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-041
कुछ लोग पत्थर से भी बत्तर होते हैं,
पत्थर भी सब बेकार नहीं होते,
उनमें भी कुछ कीमती पत्थर होते हैं।
ज़मीन पर रौंदा पड़ा हुआ,
रिश्ते-नातों से बिछुड़ा हुआ,
वक्ते-आख़िरी में तन्हा सा,
आंधियों के थपेड़े खाता सा,
आधा हरा आधा पीला सा,
आधी ज़िन्दगी-मौत के बीच,
चंद घड़ियां गिनता हुआ सा,
टूटी हुई जिंदगियों के मानिंद
शाख़ से जुदा ज़र्द पत्ता हुआ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-001
खुल कर बोलना नहीं,
ज़द में ही सिमटना होगा।
ज़िक्रे-वफ़ा न कर तू,
तुझे यूँही सिसकना होगा।
हक़ नहीं है चाहतों पर,
उसके वास्ते तरसना होगा।
इन्हें रोक सका है कौन,
आंसुओं को बरसना होगा।
संग बन जा, या मोम,
हर्फ़ तो तुझे सहना होगा।
लाखों हों दर्द अंदर,
ऊपर से तो हंसना होगा।
आज समझ ले या कल,
ज़माने को समझना होगा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-004
कही गई कोई बात समझने में देर नहीं लगती,
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-018
मुहब्बत में नाकामी मिले अगर तो,
मुहब्बत दफ़नाने के तरीके भी बहुत हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-005
बहुत लोग हैं, कहीं कोई कमी नहीं,
मजबूर को मजबूर करना ज़रूरी नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-001
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...