30.11.21

S-061 चेहरा है कुछ यूँ

चेहरा है कुछ यूं उसका पता नहीं ग़म में है कि ख़ुशी में है।
उसे पढ़ना मुश्किल है, जाने वो ख़ुदी में है कि बेख़ुदी में है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी S-061

S-060 वक़्त की पुकार

वक्त की पुकार को नज़रंदाज़ मत कीजिये,
वक्त कभी-कभी बता कर भी आ जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-060

28.11.21

S-059 कुछ गिले-शिकवे

कुछ गिले-शिकवे अजीब सी दास्ताँ होते हैं,
वे ज़ुबाँ से नहीं, निगाहों से ही अयाँ होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-059

S-059 कुछ गिले-शिकवे

कुछ गिले-शिकवे भी बड़े अजीब होते हैं,
ज़ुबाँ से नहीं, निगाहों से अयाँ हो जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-059

P-033 और कोई हमें


और कोई हमें क्या दर्द देगा, जब हमे
अपने ही ख़्यालात-जज़्बात काफ़ी हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-033

S-058 ऐसा नहीं है

ऐसा नहीं है, कि वक्त से सब ज़ख्म भर ही जाते हैं।
वक्त हो ख़राब तो कुछ ज़ख्म हरे रह ही जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-058

27.11.21

S-057 बज रहे होंगे

बज रहे होंगे मेरे ही कान, तेज़ हवाओं के झन्नाटे से,
वरना बुलाएगा भला कौन मुझे इस तन्हाई के सन्नाटे में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-057

26.11.21

S-056 चराग़ों को बिन

चराग़ों को बिन जलाए बैठे रहे हम इस उम्मीद में,
के आने से आपके वो रौशन हो जाएंगे खुद ब खुद।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-056


S-055 रात भी

रात भी कटती है कुछ इस तराह,
उम्र ही कटे जा रही है जिस तराह।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-055

S-054 ज़िन्दगी को मैं

ज़िन्दगी को मैं अब भी जीता हूँ,
कि मैं वक्त से हारा नहीं, जीता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-054

P-032 बहुत ही कम

बहुत ही कम मुस्कुराहट होठों पर अब  तो आती है,
पर जाने दो, बेचारी ग़मों से लड़ कर भी तो आती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-032

Q-031 ज़िन्दगी के दो ही

ज़िन्दगी के  दो ही साज़,
एक मैं, एक मेरी आवाज़,
तन्हाई ने सहारे छीन लिए,
और ख़ामोशी ने अल्फ़ाज़।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-031

S-053 कैसे करूं

कैसे करूं साबित खुद को, मौका तुम देते नहीं,
ज़िन्दगी कर दी थी तुम्हारे नाम, वापस तुम देते नहीं।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी"  S-053

24.11.21

S-052 हम वो मुक़्क़द्दस चराग़ हैं

हम वो मुक़्क़द्दस चराग़ हैं, जहां भी जला दिए जाएंगे,
नाम,पता ,जात पूछे बिन, वहां रोशनी किए जाएंगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-052

M-020 औरत के बिना

औरत के बिना घर नहीं चलता,
औरत के बिना चूल्हा नहीं जलता,
फेसबुक इंस्टाग्राम हैं क्या चीज़,
औरत के बिना संसार नहीं चलता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-020


S-051 ऐसा क्यों कहता है

ऐसा क्यों कहता है कि इश्क़ ने तुझे बर्बाद कर दिया,
अरे इश्क़ कामयाब है वही कि जिसने बर्बाद कर दिया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-051

Q-030 रंजो-गम

रंजो- ग़म लेकर दिल खिल नहीं सकता,

गर फट जाए दिल, तो सिल नह सकता,

पत्थर में धड़कन भरने से दिल बनते नहीं,

दूकानों से कोई दिल मिल नहीं सकता।


-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-041


23.11.21

S-049 फूल गुलाब का

फूल गुलाब का क्या मिला, हम जज़्बात में बह गए।
गुलाब तो ख़ैर मुरझा गया, मगर कांटे हाथ मे रह गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-049

M-019 ज़िन्दगी है लंबी

ज़िन्दगी है लंबी, जोड़ तोड़ बहुत हैं,
लंबे हैं सफ़र कि इनमें मोड़ बहुत हैं,
जोड़-जोड़के कहाँ तक संभाले कोई,
ज़िन्दगी में अब  तोड़-फोड़ बहुत हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-019

22.11.21

Q-029 कहने को

कहने को तो बस ख़ामोशी है,
पर हर लम्हा कुछ बोलता है।
फ़रावानी हो अगर जज़्बात की,
तो दिल सर चढ़कर बोलता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-029

P-031 मिडिल क्लास

मिडिल क्लास ने उफ़्फ़ भी न की, टेक्स देते-देते मर गए,
बाकी लोग तोड़फोड़ द्वारा सरकार से सब लेके घर गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-031


T-009 कुछ लोग

कुछ लोग पत्थर से भी बत्तर होते हैं,

पत्थर भी सब बेकार नहीं होते,

उनमें भी कुछ कीमती पत्थर होते हैं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  T-009

P-030 "अजनबी" ऐसा

"अजनबी" ऐसा कब होता है,
हंसने में भी दर्द जब होता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-030

21.11.21

K-001शाख़ से अपनी

शाख़ से अपनी टूटा हुआ,

ज़मीन पर रौंदा पड़ा हुआ,


रिश्ते-नातों से बिछुड़ा हुआ,


वक्ते-आख़िरी में तन्हा सा,


आंधियों के थपेड़े खाता सा,


आधा हरा आधा पीला सा,


आधी ज़िन्दगी-मौत के बीच,


चंद घड़ियां गिनता हुआ सा,


टूटी हुई जिंदगियों के मानिंद


शाख़ से जुदा ज़र्द पत्ता हुआ। 



-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  K-001

P-029 मुहब्बत न सही,

मुहब्बत न सही, नफ़रत तो कर,
पता तो चले तेरी मौजूदगी का।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-029

Q-028 राब्ता हो न हो

राब्ता हो न हो, वास्ता होना चाहिए,
बात बने न बने, रास्ता होना चाहिए,
फ़ैसला करें या फ़ासला चाहे जो भी,
पर थोड़ा सा आहिस्ता होना चाहिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-028

20.11.21

S-048 यक़ीनन चंद

यक़ीनन चंद नामवर ज़ईफ़ शायर शायरी भी खूब करते हैं,
मगर जाने क्यों,  वक्ते-आखिरी में गद्दारी भी खूब करते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-048

19.11.21

S-047 संगदिलों का

संगदिलों का जज़्बात-ओ-ख़्यालात से भला  क्या वास्ता,
वो तो मुजसमा भी नहीं, जब तक तराशा  नहीं जाता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-047

P-028 इतने ज़्यादा

इतने ज़्यादा भी हसीन किस काम के,
हज़ारों हो चाहने वाले जिनके नाम के।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-028

17.11.21

P-027 ज़रूरी नहीं,

ज़रूरी नहीं, आप जिसके साथ बुरा कर रहे हैं,
वोही आपको सज़ा दे, कोई और भी दे सकता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-027

P-026 हर रोज़ एक

हर रोज़ एक नया तल्ख़ तजुर्बा,
ज़िन्दगी तजुर्बों में ही गुज़रे जा रही है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-026

16.11.21

G-004 ऐ दिल, टूटे रहना

ऐ दिल, टूटे रहना होगा,
कुछ और तड़पना होगा।

खुल कर बोलना नहीं,

ज़द में ही सिमटना होगा।


ज़िक्रे-वफ़ा न कर तू,

तुझे यूँही सिसकना होगा।


हक़ नहीं है चाहतों पर,

उसके वास्ते तरसना होगा।


इन्हें रोक सका है कौन,

आंसुओं को बरसना होगा।


संग बन जा, या मोम,

हर्फ़ तो तुझे सहना होगा।


लाखों हों दर्द अंदर,

ऊपर से तो हंसना होगा।


आज समझ ले या कल,

ज़माने को समझना होगा।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-004

P-025 कही गई कोई

कही गई कोई बात समझने में देर नहीं लगती,

अगर ये पता हो कि वो किसके मुंह से निकली है?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-025

15.11.21

T-008 आप जिसके साथ

आप जिसके साथ बुरा कर रहे हैं, 
ज़रूरी नहीं कि वही आपको सज़ा देगा, कोई और भी दे सकता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-008

P-024 कुछ बातें

कुछ बातें कही-सुनी तो जाती हैं, 
आंख से कहीं होती देखी नहीं जातीं हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-024

Q-027 वो ख़ुद क्यों ना

वो ख़ुद क्यों ना बर्बाद हो जाएं,
पर हमें नाशाद करने पे तुले हैं।
हमारी कमनसीबी है कि उनकी,
ऐसे अहमक़ दोस्त हमें मिले हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-027

M-018 गोरा गाल,

गोरा गाल, उस पर,
एक लट का कमाल,
अगर दो होतीं तो, 
जाने क्या होता हाल।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-018


14.11.21

S-046 कोई अजनबी नहीं

कोई अजनबी नहीं हो जाता, "अजनबी" करार देने से,
दिल से वो निकल नहीं जाता, नज़र से उतार देने से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-046

Q-026 ज़िन्दगी, अगर

ज़िन्दगी, अगर ज़िन्दगी ही होती तो अच्छा था,
फिर भले  ही चार दिन की होती तो अच्छा था।
ना बेजा आरज़ुएं होतीं, ना लंबा इंतजार होता,
मुख्तसर राह, आसाँ मंज़िल होती तो अच्छा था।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-026

S-045 इतना मत जला कर

इतना मत जला कर मुझसे, राख़ हो जाएगी,
सलामत रह वर्ना मेरी हस्ती ख़ाक़ हो जाएगी। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-045

T-007 भटक रहे हो

भटक रहे हो कि तुम्हे एक घर चाहिए,
घर तो दिया है तुम्हे खुदा ने, मगर
घर को घर समझने वाला भी तो चाहिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-007


13.11.21

S-043 मुस्कुरा कर

मुस्कुरा कर पीता हूं, रोनेवालों में से नहीं हूँ,
होशवालों तुम ये न समझो मैं दर्द में नहीं हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-043

S-042 भरभरा कर

भरभरा कर गिर गए ताल्लुक़ात झटके में,
बड़ा वक्त लगा था जिनको तामीर करने में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-042

S-041 माना कि दिखाई

माना कि दिखाई नहीं देता कुछ भी नशे में इंसाँ को,
पर बचता क्यों है वो आंख मिलाने से नशा उतर जाने के बाद।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-041

P-023 जिनको मालूम नहीं

जिनको मालूम नहीं अंजामे-वफ़ा,
उन्हें कोई मिलाए मेरी ज़िंदगी से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-023

P-022 अब हमें न और

अब हमें न और सिखा ज़िन्दगी, हम तो सीख लिए,
उनको सिखा जो आएं हैं क़यामत तक जीने के लिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-022

M-017 अलगाववादी,

अलगाववादी, राष्ट्रद्रोही बड़े नंग हो रहे हैं,
राष्ट्रविरोधियों के नए चेहरे उत्पन्न हो रहे हैं,  
कोई बता रहा है क्रांतिकारियों को गद्दार, 
दल-विरोध में वो देश के दुशमन हो रहे हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-017

G-003 लो खत्म आज

लो ख़त्म आज से सब सिलसिले हुए,
लो आइंदा से ये होठ भी हैं सिले हुए।

दफ़्न एक ही झटके में  सब गिले हुए,
न रख मलाल कोई,  ख़त्म मसले हुए।

लम्बी कुरबतेँ जो थीं हमारे दरमियाँ,
तब्दील हो गईं, अब वो फ़ासिले हुए।

जिनसे पहुंचे थे इस मुकामे-इश्क़ पर,
लो खत्म आज वो तमाम वसीले हुए।

दिलकश बारिशें और बाद-ऐ-नौबहार,
सब बदल कर आज से ज़लज़ले हुए।

न जज़्बात न एहसास रहेंगे क़ाबिज़ 
हम आज से "अजनबी" पथरीले हुए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-003

M-016 आग दोनों तरफ़

आग दोनों तरफ लगी हो तो,
चूल्हे में आग जले न जले।
भूख मिटने से मतलब है
रोटी मिले न मिले।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-016

12.11.21

T-006 मेरी ही कोई

मेरी ही कोई ख़ता होगी मान मैं लेता हूँ,
सच कहने की अब जुर्रत रही नहीं,
यही कहके दिल को तसल्ली दे लेता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  T-006

P-021 राजनीति में

राजनीति में शत्रु तो हैं, मित्र नहीं,
मीठे-मीठे बोल तो हैं, चरित्र नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-021

11.11.21

T-005 मुहब्बत जताने

मुहब्बत जताने के सलीके भी बहुत हैं,

मुहब्बत में नाकामी मिले अगर तो,

मुहब्बत दफ़नाने के तरीके भी बहुत हैं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-005




10.11.21

P-020 कहते हैं हर ज़ख्म

कहते हैं हर ज़ख्म का इलाज है वक्त,
मगर ये पता नहीं मिलता कहाँ है वक्त।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-020

P-019 हमने तो सुना था

हमने तो सुना था जो कर देती है बर्बाद, उसे 'नफरत' कहते हैं,
पर ये ज़माने वाले भी हैं अजब, ये उसको 'मुहब्बत' कहते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-019

P-018 दिल टूट गया

दिल टूट गया तो टूट गया, इसमें ग़म है किस बात का,
टूटने की गूंज मगर जाती नहीं, ग़म तो है इस बात का।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-018

Q-025 रौशन चराग़ों

रौशन चराग़ों को यूं न बुझा,
सहर तक वही जले जाते हैं। 
जुगनुओं से उजाले नहीं होते,
वो तो आते और चले जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-025

9.11.21

S-040 बरतरफ़ कर दिया

बरतरफ़ कर दिया जाता है इंसाँ को, काम निकल जाने के बाद,
भला कौन रखता है बुझी तिल्ली को आग सुलग जाने के बाद।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-040


8.11.21

T-002 गर अपनी मर्ज़ी

गर अपनी मर्ज़ी से ज़िन्दगी बितानी है,
तब ही ये ज़िन्दगी ज़िन्दगी है, नहीं तो
मर्ज़ी बिना तो यह सिर्फ़ ज़िन्दगानी है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-002

Q-002 अपनों की सख्तियां

अपनों की सख्तियां और तल्खियाँ झिल जातीं हैं,
वरना इनसे निजात पाने में तो ज़िंदगियाँ निकल जातीं हैं,
बहुत सोचा किये, अपने लिए भी कभी जी पाएंगे हम,
जद्दोजहद में इसकी मगर सदियाँ निकल जाती हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-002

S-001 बहुत लोग हैं

बहुत लोग हैं, कहीं कोई कमी नहीं,

मजबूर को मजबूर करना ज़रूरी नहीं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-001

Q-024 फ़क्त रूह से रूह

फ़क्त रूह से रूह का इश्क़ कभी होता नहीं,
जिस्म के बिना भी,  इश्क कहीं होता नहीं,
इश्क को जिस्म से जुदा समझने वालों,
हवाओं में आशिक़ माशूक कभी होता नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-024

Q-023 ख़्यालात के वास्ते

ख़्यालात के वास्ते जज़्बात चाहिए,
जज़्बात निकलने को अल्फ़ाज़ चाहिए,
लिखने सुनने को शायरी, ऐ "अजनबी",
दिल पर किसी चोट का एहसास चाहिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-023

S-039 ये दुरुस्त नहीं

ये दुरुस्त नहीं कि लोग बदल गए हैं,
हाँ, उनके नज़रिये, पैमाने बदल गए हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-039

7.11.21

S-038 चल रहा था

चल रहा था सीधे सादे, वो कहीं मुड़ा नहीं, 
रास्ते ही मुड़ गए,  उसकी कोई ख़ता नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-038

5.11.21

P-017 जब सभी धर्मों ने

जब सभी धर्मों ने धर्म को हर बात का केंद्र बिंदु बना दिया,
तो ग़लत क्या है जो मोदी ने हिंदुओं को हिन्दू बना दिया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-017

M-015 दोनों ही हैं गुनहगार

दोनों ही हैं गुनाहगार, तू भी मैं भी,
कोई दूध का धुला नहीं, तू भी मैं भी।
किसपे उठाएं उंगली, दौरे-हाज़िर में,
हमाम में सब नंगे हैं, तू भी, मैं भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-015
 

Q-022 दोनों ही गुनहगार

दोनों ही हैं गुनाहगार हैं, तू भी मैं भी,
कोई दूध का धुला नहीं, तू भी मैं भी।
किसपे उठाएं उंगली, दौरे-हाज़िर में,
हमाम में सब ही हैं नंगे, तू भी, मैं भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-022

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...