17.11.21

P-026 हर रोज़ एक

हर रोज़ एक नया तल्ख़ तजुर्बा,
ज़िन्दगी तजुर्बों में ही गुज़रे जा रही है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-026

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...