16.11.21

G-004 ऐ दिल, टूटे रहना

ऐ दिल, टूटे रहना होगा,
कुछ और तड़पना होगा।

खुल कर बोलना नहीं,

ज़द में ही सिमटना होगा।


ज़िक्रे-वफ़ा न कर तू,

तुझे यूँही सिसकना होगा।


हक़ नहीं है चाहतों पर,

उसके वास्ते तरसना होगा।


इन्हें रोक सका है कौन,

आंसुओं को बरसना होगा।


संग बन जा, या मोम,

हर्फ़ तो तुझे सहना होगा।


लाखों हों दर्द अंदर,

ऊपर से तो हंसना होगा।


आज समझ ले या कल,

ज़माने को समझना होगा।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-004

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...