कही गई कोई बात समझने में देर नहीं लगती,
अगर ये पता हो कि वो किसके मुंह से निकली है?
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-025
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-025
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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