चेहरा है कुछ यूं उसका पता नहीं ग़म में है कि ख़ुशी में है।
उसे पढ़ना मुश्किल है, जाने वो ख़ुदी में है कि बेख़ुदी में है।
उसे पढ़ना मुश्किल है, जाने वो ख़ुदी में है कि बेख़ुदी में है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी S-061
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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