बर्बाद हम खुद हुए,
फिर आप क्यों शर्मसार बैठे हैं।
फिर आप क्यों शर्मसार बैठे हैं।
सज़ा हमको मिली,
तो आप क्यों ख़तावार बैठे हैं।
हम ही दरबदर हुए,
भला आप क्यों बेज़ार बैठे हैं।
क्यों लें आप तोहमतें,
यहां हम जो ख़ाकसार बैठे हैं।
कितने देगा ग़म ज़माना,
जब हम जैसे ग़मगुसार बैठे हैं।
हम नहीं हक़दार आपके,
इसीलिए तो बेइख़्तियार बैठे है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-005
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