लो ख़त्म आज से सब सिलसिले हुए,
लो आइंदा से ये होठ भी हैं सिले हुए।
लो आइंदा से ये होठ भी हैं सिले हुए।
दफ़्न एक ही झटके में सब गिले हुए,
न रख मलाल कोई, ख़त्म मसले हुए।
लम्बी कुरबतेँ जो थीं हमारे दरमियाँ,
तब्दील हो गईं, अब वो फ़ासिले हुए।
जिनसे पहुंचे थे इस मुकामे-इश्क़ पर,
लो खत्म आज वो तमाम वसीले हुए।
दिलकश बारिशें और बाद-ऐ-नौबहार,
सब बदल कर आज से ज़लज़ले हुए।
न जज़्बात न एहसास रहेंगे क़ाबिज़
हम आज से "अजनबी" पथरीले हुए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-003
No comments:
Post a Comment