13.11.21

G-003 लो खत्म आज

लो ख़त्म आज से सब सिलसिले हुए,
लो आइंदा से ये होठ भी हैं सिले हुए।

दफ़्न एक ही झटके में  सब गिले हुए,
न रख मलाल कोई,  ख़त्म मसले हुए।

लम्बी कुरबतेँ जो थीं हमारे दरमियाँ,
तब्दील हो गईं, अब वो फ़ासिले हुए।

जिनसे पहुंचे थे इस मुकामे-इश्क़ पर,
लो खत्म आज वो तमाम वसीले हुए।

दिलकश बारिशें और बाद-ऐ-नौबहार,
सब बदल कर आज से ज़लज़ले हुए।

न जज़्बात न एहसास रहेंगे क़ाबिज़ 
हम आज से "अजनबी" पथरीले हुए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-003

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