28.11.21

S-059 कुछ गिले-शिकवे

कुछ गिले-शिकवे अजीब सी दास्ताँ होते हैं,
वे ज़ुबाँ से नहीं, निगाहों से ही अयाँ होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-059

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...