वो ख़ुद क्यों ना बर्बाद हो जाएं,
पर हमें नाशाद करने पे तुले हैं।
हमारी कमनसीबी है कि उनकी,
ऐसे अहमक़ दोस्त हमें मिले हैं।
पर हमें नाशाद करने पे तुले हैं।
हमारी कमनसीबी है कि उनकी,
ऐसे अहमक़ दोस्त हमें मिले हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-027
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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