12.11.21

T-006 मेरी ही कोई

मेरी ही कोई ख़ता होगी मान मैं लेता हूँ,
सच कहने की अब जुर्रत रही नहीं,
यही कहके दिल को तसल्ली दे लेता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  T-006

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...