शाख़ से अपनी टूटा हुआ,
ज़मीन पर रौंदा पड़ा हुआ,
रिश्ते-नातों से बिछुड़ा हुआ,
वक्ते-आख़िरी में तन्हा सा,
आंधियों के थपेड़े खाता सा,
आधा हरा आधा पीला सा,
आधी ज़िन्दगी-मौत के बीच,
चंद घड़ियां गिनता हुआ सा,
टूटी हुई जिंदगियों के मानिंद
शाख़ से जुदा ज़र्द पत्ता हुआ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-001
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