21.11.21

K-001शाख़ से अपनी

शाख़ से अपनी टूटा हुआ,

ज़मीन पर रौंदा पड़ा हुआ,


रिश्ते-नातों से बिछुड़ा हुआ,


वक्ते-आख़िरी में तन्हा सा,


आंधियों के थपेड़े खाता सा,


आधा हरा आधा पीला सा,


आधी ज़िन्दगी-मौत के बीच,


चंद घड़ियां गिनता हुआ सा,


टूटी हुई जिंदगियों के मानिंद


शाख़ से जुदा ज़र्द पत्ता हुआ। 



-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  K-001

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