ज़िन्दगी, अगर ज़िन्दगी ही होती तो अच्छा था,
फिर भले ही चार दिन की होती तो अच्छा था।
ना बेजा आरज़ुएं होतीं, ना लंबा इंतजार होता,
मुख्तसर राह, आसाँ मंज़िल होती तो अच्छा था।
फिर भले ही चार दिन की होती तो अच्छा था।
ना बेजा आरज़ुएं होतीं, ना लंबा इंतजार होता,
मुख्तसर राह, आसाँ मंज़िल होती तो अच्छा था।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-026
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