31.3.23

M-057 कुछ दूर के लिए हमसफ़र

कुछ दूर के लिए हमसफ़र था वो,
किसी दोराहे से मुड़ जाने के लिए।
मेरे साथ चल तो रहा था वो, पर
मुझको अकेला छोड़ जाने के लिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-057

Q-104 कभी गुलशन

कभी गुलशन कभी सहरा,
अंदाज़ कई, एक ही चेहरा,
कभी दुश्मन, कभी दोस्त,
इंसाँनी रूप बहुत ही गहरा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-104

30.3.23

M-056 जीवन नहीं चलता

जीवन नहीं चलता कुंठित होकर,
कुछ हल नहीं होता चिंतित होकर,
आदमी एक सामाजिक प्राणी है,
रह नहीं सकता स्वयं सीमित होकर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-056

29.3.23

S-248 बदलते चेहरे

बदलते चेहरे देखने का मुझे शौक नहीं,
इसीलिए इशक़ करना मेरा ज़ौक़ नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-248

S-247 ख़ामोशी तो बस

ख़ामोशी तो बस नाम की है दोस्त,
दिल तो धड़कना बन्द नही करता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-247

Q-103 अभी तो एक की

अभी तो एक की सज़ा मिली,
अभी तो कई हैं गुनाह बाकी।
अभी न समझो सहर हो गई, 
अभी तो रात  है बहुत बाकी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-103

Q-102 बंदे को तूने

बंदे को तूने कब से 'चौखट' पर बैठा रक्खा है।
तमाम रंजोग़म को उसने दिल मे दबा रक्खा है,
भला कब होगी तेरी इनायत उस पर ऐ मालिक,
तूने कबसे उसे अपनी रहमत से तरसा रक्खा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-102

28.3.23

S-246 चिलमन पर नज़रें

चिलमन पर नज़रें गड़ाए हुए हैं हम अपनी,
जाने किस पल हवा का झोंका आ जाए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-246

P-203 शौके-दीदार में,

शौके-दीदार में, चेहरे पे थोड़ी सी मुस्कान क्या आई मेरे,
लोगों को फिरसे "अजनबी" सा नज़र आने लगा हूँ मैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-203

M-055 टेढी-मेढ़ी सी विचित्र

टेढ़ी-मेढ़ी सी विचित्र राहें चलते हैं,
दुनियाँ से कुछ पृथक चलने वाले।
स्वयं को खोकर स्वयं को ढूंढते हैं,
ये दुनियाँ को भाड़ में भेजने वाले।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-055

27.3.23

M-054 हमे क्या पता था

हमे क्या पता था ख़रीदी जा सकती है मुहब्बत दुकानों से भी,
हम भी ख़रीद सकते थे एक अदद मुहब्बत अपने वास्ते भी। 
बड़ी देर से खुली ये दुकान, काश कि ज़रा पहले खुल जाती, 
मुहब्बत के वास्ते किसी के न्योहरे तो न करने पड़ते हमे भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-054

26.3.23

S-245 मशहूर हो गया हूँ

मशहूर हो गया हूँ अपने दर्द-ओ-ग़म के लिए इस कदर,
कि अब लोग मुझे मेरे चेहरे से नहीं मेरे दर्द से पहचानते हैं।








-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-245












बी" S-245
x

S-244 दफ़ना सकते हो

दफ़ना सकते हो तुम जिस्म को, मेरी रूह को नहीं,
अनसुना कर सकते हो मुझे, मेरी ख़ामोशी को नहीं।









-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-244

S-243 इश्क़-मुहब्बत में

इश्क़-मुहब्बत में पेश आती हैं परेशानियां ही परेशानियां,
सूरते-बेवफ़ाई में सताती हैं मुहब्बत के दिनों की निशानियां।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-243

24.3.23

P-202 खामोश होने

ख़ामोश होने से मुहब्बत ख़त्म कहाँ होती है। 
ख़ामोशी से तो मुहब्बत और  जवाँ होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-202

20.3.23

T-033 जलने-जलने में

जलने-जलने में भी फ़र्क़ होता है
कोई जलता है इश्क़ की आग में,
कोई जलता है नफ़रत की आग में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-033

19.3.23

M-052 बहुत महंगी

बहुत महंगी होगई है मुस्कुराहट अब,
न दिखती है ज़िन्दगी में न तस्वीर में।
फिरभी उसे ज़िंदा रक्खे हैं हम शायर
अपने ख़्वाबों ख्यालों और तहरीर में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-052

18.3.23

P-201 कोई कमी नहीं,

कोई कमी नहीं है, दुनियाँ में खुशियां भरी पड़ीं हैं,
बस लोग ही नफ़रतों में जीने के आदी हो गए हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-201

17.3.23

K-005 विचित्र है इंसान

विचित्र है इंसान
किसी ने दे दी जान
किसी को बचाने को।
किसी ने एक कर दिया 
धरती और आसमान
किसी को मिटाने को।
प्रेम की तो बात छोड़ो
आतुर रहता है इंसान
सबको भाड़ में पहुंचाने को।
स्वर्ग भी यहीं है
नरक भी यहीं है
प्रतीक्षा करो न्याय पाने को।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-005

16.3.23

Q-101 उसके जुदा होने से

उसके जुदा होने से कुछ नहीं बदला,
वही तमन्ना वही आरज़ू वही जोश है।
फ़र्क़ इतना सा हो गया है "अजनबी"
इश्क़ के पहले ज़ुबाँ थी अब ख़ामोश है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-101

S-242 फ़क़्त एक तारा टूट

फ़क़्त एक तारा टूट गया तो क्या हुआ,
बेशुमार सितारे और भी हैं आसमाँ में। S-242

15.3.23

Q-100 मैं अपनी शाख़

मैं अपनी शाख़ से रहा बावफ़ा सदा,
इतने पतझड़ आए गए कब गिरा हूँ।
जब शाख़ ने ही मुझे कर दिया जुदा,
शजर के नीचे ज़मीं पर अब गिरा हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-100

P-200 तेरी तरह मैं भी

तेरी तरह, मैं भी भूलना तो चाहता हूँ तुझे,
पर तेरी जैसी कमज़ोर याददाश्त लाऊं कहाँ से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-200

Q-099 हुस्न वाले खुद ही

हुस्न वाले ख़ुद ही हैं मुंसिफ,
इश्क़ का कानून बड़ा लचर है।
भला ख़ुद को क्यों देंगे सज़ा,
क़ातिल तो उन्हीं की नज़र है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-099

P-199 जबसे दोस्त बन गए हैं

जबसे दोस्त बन गए हैं दुश्मन "अजनबी",
दुश्मनों को भी अब याद करना पड़ता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-199

P-198 ऊपर वाला

ऊपर वाला हर बात की सज़ा दे रहा होता है,
पर ये नहीं पता कब किस बात की दे रहा होता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-198

P-197 न ज़मीं धंस जाएगी

न तो ज़मीं धंस जाएगी, और ना आसमाँ झुक जाएगा,
जुदा होने से किसी के, काम किसका कहाँ रुक जाएगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-197

13.3.23

M-052 हम ही नहीं

हम ही नहीं जल रहे इश्क में अकेले, 
आप भी जल रहे हैं, कम या ज़्यादा।
आपको खोकर हाथ मलते रहे हम,
आप भी मल रहे हैं, कम या ज़्यादा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-052

P-196 आपके लिए सारा

आपके लिए सारा ज़माना ख़राब था, अब लाजवाब हो गया क्या?
आपका नज़रिया अब अच्छा है, और हमारा अब ख़राब हो गया क्या? P-196

P-195 क्यों इतना संभाल

क्यों इतना संभाल के रखते हो रिश्तों को  ऐ "अजनबी",
करोगे क्या  तुम इनका, "यूज़ एंड थ्रो" के इस ज़माने में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-195

Q-098 ये दुनियाँ सिमट गई

ये दुनियाँ सिमट गई होती बुतों में,

इंसाँ का वास्ता गर इंसाँ से न होता। 

मैंभी क्यूँ करता मुहब्बत किसी से,

हुस्न अगर मुहब्बतों के वास्ते न होता।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-098


S-241 वफ़ादारी तो यूंही

वफ़ादारी तो यूंही फ़नाह हो जाती है ख़ामोशी में,
बेवफ़ाओं का इश्क़ मे  फिरभी मुक़ाम ख़ास होता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-241

Q-097 ख़ुशियाँ चली गईँ

ख़ुशियां चली गईं सभी, मगर 
मुस्कुराने की आदत नहीं गई।
इंतज़ार भी खत्म हुआ, मगर 
इन्तज़ार की आदत नहीं गई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-097

S-240 बदलती दुनिया मे

बदलती दुनियाँ में आशना भी अजनबी नज़र आते हैं।
कल तलक थे दोस्त, आज दुश्मनी पर उतर आते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-240

12.3.23

S-239 नई राहें पकड़ लीं

नई राहें पकड़ लीं, जानते ही नहीं कहाँ जा रहे हैं।
बस ज़िद पर अड़े हैं, जानते ही नहीं क्या गंवा रहे हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-239

11.3.23

S-238 तेरे बिना ज़िन्दगी

तेरे बिना ज़िन्दगी गुज़ार भी नहीं सकते।

बेवफ़ा तुझे दिल से उतार भी नहीं सकते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-238

6.3.23

S-237 गिर कर हर किसी को

गिर कर हर किसी को चोट नहीं लगती,
शाद रहते हैं कुछ लोग नज़र से गिरकर भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-237

5.3.23

P-194 मुहब्बतों में

मुहब्बतों में कंजूसी,नफ़रतों में फ़राख़दिली,
इंसाँ टस से मस न हुआ न कोई इबरत ही मिली।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-194

M-051 होली आती है

होली आती है और चली जाती है,
बरसों से यूंही ये गुलाल रक्खा है।
ढूंढे से नहीं मिल रहे वो रुख़सार, 
जिनके लिए उसे संभाल रक्खा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-051


4.3.23

Q-096 चेहरे अपने ही

चेहरे अपने ही पहचाने न होते,
ग़लती लोग कभी माने न होते,
तोहमतें अपना काम कर जातीं,
दुनियाँ में अगर आईने न होते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-096

2.3.23

S-236 कभीकभी

कभी कभी फ़ैसले भी बड़े अजीब होते हैं,
वोही कर लेते हैं फ़ासले,जो करीब होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-236

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...