किसी दोराहे से मुड़ जाने के लिए।
मेरे साथ चल तो रहा था वो, पर
मुझको अकेला छोड़ जाने के लिए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-057
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
मशहूर हो गया हूँ अपने दर्द-ओ-ग़म के लिए इस कदर,
कि अब लोग मुझे मेरे चेहरे से नहीं मेरे दर्द से पहचानते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-245
बी" S-245
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दफ़ना सकते हो तुम जिस्म को, मेरी रूह को नहीं,
अनसुना कर सकते हो मुझे, मेरी ख़ामोशी को नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-244
ये दुनियाँ सिमट गई होती बुतों में,
इंसाँ का वास्ता गर इंसाँ से न होता।
मैंभी क्यूँ करता मुहब्बत किसी से,
हुस्न अगर मुहब्बतों के वास्ते न होता।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-098
तेरे बिना ज़िन्दगी गुज़ार भी नहीं सकते।
बेवफ़ा तुझे दिल से उतार भी नहीं सकते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-238
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-051
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...