27.3.23

M-054 हमे क्या पता था

हमे क्या पता था ख़रीदी जा सकती है मुहब्बत दुकानों से भी,
हम भी ख़रीद सकते थे एक अदद मुहब्बत अपने वास्ते भी। 
बड़ी देर से खुली ये दुकान, काश कि ज़रा पहले खुल जाती, 
मुहब्बत के वास्ते किसी के न्योहरे तो न करने पड़ते हमे भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-054

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...