28.3.23

M-055 टेढी-मेढ़ी सी विचित्र

टेढ़ी-मेढ़ी सी विचित्र राहें चलते हैं,
दुनियाँ से कुछ पृथक चलने वाले।
स्वयं को खोकर स्वयं को ढूंढते हैं,
ये दुनियाँ को भाड़ में भेजने वाले।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-055

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K-007 सूरज को मैं

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