बंदे को तूने कब से 'चौखट' पर बैठा रक्खा है।
तमाम रंजोग़म को उसने दिल मे दबा रक्खा है,
भला कब होगी तेरी इनायत उस पर ऐ मालिक,
तूने कबसे उसे अपनी रहमत से तरसा रक्खा है।
तमाम रंजोग़म को उसने दिल मे दबा रक्खा है,
भला कब होगी तेरी इनायत उस पर ऐ मालिक,
तूने कबसे उसे अपनी रहमत से तरसा रक्खा है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-102
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