होली आती है और चली जाती है,
बरसों से यूंही ये गुलाल रक्खा है।
ढूंढे से नहीं मिल रहे वो रुख़सार,
जिनके लिए उसे संभाल रक्खा है।
बरसों से यूंही ये गुलाल रक्खा है।
ढूंढे से नहीं मिल रहे वो रुख़सार,
जिनके लिए उसे संभाल रक्खा है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-051
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