17.3.23

K-005 विचित्र है इंसान

विचित्र है इंसान
किसी ने दे दी जान
किसी को बचाने को।
किसी ने एक कर दिया 
धरती और आसमान
किसी को मिटाने को।
प्रेम की तो बात छोड़ो
आतुर रहता है इंसान
सबको भाड़ में पहुंचाने को।
स्वर्ग भी यहीं है
नरक भी यहीं है
प्रतीक्षा करो न्याय पाने को।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-005

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