जलने-जलने में भी फ़र्क़ होता है
कोई जलता है इश्क़ की आग में,
कोई जलता है नफ़रत की आग में।
कोई जलता है इश्क़ की आग में,
कोई जलता है नफ़रत की आग में।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-033
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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