31.3.23

Q-104 कभी गुलशन

कभी गुलशन कभी सहरा,
अंदाज़ कई, एक ही चेहरा,
कभी दुश्मन, कभी दोस्त,
इंसाँनी रूप बहुत ही गहरा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-104

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...