मैं अपनी शाख़ से रहा बावफ़ा सदा,
इतने पतझड़ आए गए कब गिरा हूँ।
जब शाख़ ने ही मुझे कर दिया जुदा,
शजर के नीचे ज़मीं पर अब गिरा हूँ।
इतने पतझड़ आए गए कब गिरा हूँ।
जब शाख़ ने ही मुझे कर दिया जुदा,
शजर के नीचे ज़मीं पर अब गिरा हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-100
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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