"वक़्त की परछाइयाँ रुख पे नुमाया हो गईं"।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-090
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
आदमी जितना चिल्लाता है,
खुदको उतना ही कमज़ोर दर्शाता है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-056
मेरे बाहर जाने के बाद,
अकेले होते हैं जब यादों के पौधे,
तो रोज़ एक चिरैया आती है,
पौधों के इर्दगिर्द कुछ गाती है,
एकाकीपन कुछ दूर कर जाती है,
वो पौधे हैं अलग किस्म के,
जिनमे फूल नहीं खिलते,
न खिलेंगे, न ही खुशबू देंगे,
हरियाली से ही खुश हो लेता हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-002
याद उसको ही करता रहा हूँ मैं,
बेवफ़ा जिसको कहता रहा हूँ मैं।
ये दिल उधर ही खिंचता गया,
जिधर जाने से रोकता रहा हूँ मैं।
बड़ा कमज़ोर निकला ये दिल,
मज़बूत जिसे समझता रहा हूँ मैं।
आती जाती रहीं बहारें हर सिम्त,
इक मुस्कान को तरसता रहा हूँ मैं।
तमन्नाएं जलके खाक़ भी हो गईं,
फिर भी अबतक सुलगता रहा हूँ मैं।
हर बार उजाड़ा चमन खिज़ाओं ने,
फिर भी बहारों को तकता रहा हूँ मैं।
वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-006
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...