31.1.22

S-090 जितना लड़ा

जितना लड़ा ज़माने की ज़्यादतियों से मैं,
"वक़्त की परछाइयाँ रुख पे नुमाया हो गईं"।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-090

S-089 जो पन्ना खोला

 जो पन्ना खोला किताबे-दिल का,
"उनकी यादों के ही गुलाब मिले"।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-089

S-088 इश्क़ में ऐसा भी

इश्क़ में ऐसा भी कभी मुक़ाम आता है,
दोस्त का भी जब दुश्मनों में नाम आता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-088

30.1.22

Q-042 प्यार-मुहब्बत

प्यार-मुहब्बत की ज़मी पर नफ़रतों के बीज बो देते हैं,
बेहद हसीन वक्त ज़िन्दगी का हम खुद ही खो देते हैं,
नहीं छोड़ते ज़िद, नहीं मानते वक़्त के तक़ाज़े को,
गुज़र जाता है जब वक्त, दोष अपने नसीब को देते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-042

P-056 आदमी जितना

आदमी जितना चिल्लाता है,

खुदको उतना ही कमज़ोर दर्शाता है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-056


28.1.22

P-055 रिश्तों को भी

रिश्तों को भी वादों की तरह तोड़ने लगे,
रिश्तों में भी लोग जोड़-तोड़  करने लगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-055

S-087 आप क्यों करेंगे

आप क्यों करेंगे ज़हमत आने की, आप तो दूर ही रहेंगे,
आपको अपनी अना का नशा है, आप तो चूर ही रहेंगे। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-087

26.1.22

P-054 मैं तो अजनबी

मैं तो अजनबी हूँ, लोग तो 'करीबी' से भी बचते हैं,
हो जाए अगर सामना, तो नज़रंदाज़ ही करते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी'  P-054

25.1.22

S-086 आप 'बाहर' निकले

आप 'बाहर' निकले ही क्यों थे भला, इस 'मौसम' में,
बदलना तो लाज़िम था आपका, बाहर की तेज़ 'हवाओं' में।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-086

Q-041 चमकता हुस्नो-जमाल

चमकता हुस्नो-जमाल भी क्या शय है,
बिना इसके कोई मुहब्बत नहीं करता।
क्यों करते हैं सब रूहानी इश्क़ की बातें,
जब जिस्म सिवा कोई बात नहीं करता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-041



 

P-053 वक़्त हरेक का अच्छा-बुरा

वक़्त हरेक का अच्छा-बुरा बता देता है अच्छा कौन, बुरा कौन,
वक़्त है पैमाना इंसाँ को परखने का, सच्चा कौन झूंटा कौन।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-053

P-052 इतनी इज़्ज़त भी

इतनी  इज़्ज़त भी न दो किसी को कि हज़्म भी न कर सके उसे,
इतनी ज़्यादा तारीफ़ भी न करो उसकी कि सच ही समझ बैठे उसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-052

24.1.22

Q-040 रवादारी, रिश्ते-नाते

रवादारी, रिश्ते-नाते,और प्यार-मुहब्बत, 
इंसानियत,अपनाइयत,उंसियत,मुरव्वत,
आइंदा वक्त में सब ही ख़त्म हो जाएंगे,
जो आजतक तो ज़िंदा थे कुछ हद तक।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-040


P-051 ज़्यादा अच्छा होना

ज़्यादा अच्छा होना भी अच्छा नहीं औरों के साथ,
कभी -कभी बुरा होना भी बुरा नहीं बुरों के साथ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-051

K-002 एक गमले में

एक गमले में लगा छोड़े हैं,
मैंने तेरी यादों के पौधे,
रोज़ उन्हें पानी दे देता हूँ
खोल देता हूँ खिड़कियां,
कहीं मुरझा न जाएं वो,
दरीचों के पर्दे हटा देता हूँ।

मेरे बाहर जाने के बाद,

अकेले होते हैं जब यादों के पौधे,

तो रोज़ एक चिरैया आती है,

पौधों के इर्दगिर्द कुछ गाती है,

एकाकीपन कुछ दूर कर जाती है,


वो पौधे हैं अलग किस्म के,

जिनमे फूल नहीं खिलते,

न खिलेंगे, न ही खुशबू देंगे,

हरियाली से ही खुश हो लेता हूँ।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-002


23.1.22

P-050 अंदर का हाले-दिल

अंदर का हाले-दिल तेरा मैं जानता नहीं,
कहता हूँ तुझे बेवफ़ा पर मैं मानता नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-050

S-085 एक तंग दायरे में

एक तंग दायरे में ही महदूद रहते थे हम "अजनबी",
फिर हुआ यूं एक ही शख्स ने हमे पूरी दुनियां दिख़ा दी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-085

22.1.22

S-084 आपको हसीन आदत

आपको हसीन आदत है बार-बार आईना निहारने की,
हम इश्क़ में सब्र और आईने जैसी वफ़ादारी कहाँ से लाएं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S- 084


S-083 मामूली सा ही सही

मामूली सा ही सही मगर मैं एक ख़्याल हूँ,
दिलो-ओ-दिमाग़ में कौंधता एक सवाल हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-083

S-082 इश्क़ जिस्मानी हो या

इश्क़ जिस्मानी हो या रूहानी हो,
टिकता वही है जिसमे रवानी हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-082

21.1.22

P-049 ज़माने से न बता

ज़माने से न बताती फिरा कर, तूने मुझे क्या दिया,
मुझसे नज़र मिलाके भी कभी बात कर ऐ ज़िन्दगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-049


S-081 घर के कोने में

घर के कोने में मैंने बो रक्खे हैं कुछ ग़म,
मुझे आदत है रोज़ ताज़ा ग़म खाने की।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-081



20.1.22

P-048 अपनों का हमकदम

अपनों का हमकदम रह, ऐसा न हो वो पीछे छूट जाऐं,
रिश्तों को इतना भी ज़्यादा मत परख़ कि वो टूट जाऐं।

-वीरेंद्र सिन्हा"अजनबी" P-048

M-021 भीड़ है बहुत,

भीड़ है बहुत, मगर वीरानी सी छाई है,
लप-लपा रही है लौ, आंधी सी आई है,
बुझना है तो बुझ जा उम्मीदों के चराग़,
थक गया हूँ मैं,मुझेभी नींद सी आई है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-021

P-047 हर कोई लगता है

हर कोई लगता है अजनबी, अपनों को पहचानना मुश्किल है,
हर कोई हो गया है मतलबी, हमदर्दों को पहचानना मुश्किल है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-047


Q-039 इसी ज़मीं पर

इसी ज़मीं पर कब्रिस्तान, इसी पे चमन है,
मुफ़लिस भी ज़मींदार भी इसी में दफ़न है,
दौलतमंदी के ख्वाहिशमंद इंसाँ को देखो,
साथ कुछ नहीं, बदन पर उसके कफ़न है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-039

19.1.22

S-080 कितना भी तंगदस्त

तंगदस्त नहीं है ज़माना, उसके पास ग़मों की बड़ी इफ़रात है।
भूखा न मरने देगा ज़माना मुझे, ग़म खाना ही तो मेरी ख़ुराक़ है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-080

18.1.22

P-046 वो रिश्ते होते ही

वो रिश्ते होते ही कब हैं, जो बनते ही टूट जाते हैं,
वो तो ख्वाब होते हैं जो नींद खुलते ही टूट जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-046

P- 045मेलजोल देखा

मेलजोल देखा हमने किस्म किस्म का,
हरेक में खेल है बस जिस्म जिस्म का।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P -045

17.1.22

S-079 तंगदिल तो थे

तंगदिल तो थे आप, अब संगदिल क्यों हो गए, 
मेरे मुख़ालिबों की भीड़ में आप शामिल क्यों हो गए।

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-079

S-078 सच्चाई उड़ा देगी

सच्चाई उड़ा देगी होश मेरे, झूंट ही बोल दो,
मेरे दर्द को और हवा न दो, झूंट ही बोल दो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-078

S-077 जाने क्यों कहते

जाने क्यों कहते हैं लोग, आप दिल के अच्छे हैं,
पर दिल तो है नहीं आपके, फिर कहाँ के अच्छे हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-077

16.1.22

S-076 मैं तो बड़े

मैं तो बड़े सुकून में था तुझको भुलाकर,
तेरे हमशक्ल तेरे हमनाम सुकूँ छीन लेते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-076

15.1.22

S-075 हर कोई फ़िदा

हर कोई फ़िदा है इन इमारतों की बुलंदियों  पर,
किसे पता इनकी तामीर में कितने ज़मींदोस हुए।
 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-075

14.1.22

P-044 काश दुनियां में

काश दुनियां में कोई शख्सियत ऐसी भी होती,
वक़्त के साथ जिसकी फ़ितरत न बदली होती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-044


13.1.22

S-074 दिल को भी

दिल को भी बगैर दर्द सुकूँ नहीं मिलता,
अब ये भी बेचारा ख़ूगर-ऐ-दर्द हो गया है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-074

P-043 दर्द देने वालों

दर्द देने वालों के चेहरे भी कभी-कभी ज़र्द होते हैं,
दर्द देते-देते जब उनको भी कभी-कभी दर्द होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-043

S-073 दर्द में भी

दर्द में भी तस्कीन सी अब मिलने लगी,
हाले-दिल बयानी पर वाह-वाह जब मिलने लगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-073

12.1.22

Q-038 तोड़ दिया

तोड़ दिया भरोसा जब,
तो अब कस्में क्या, वादे क्या?
टूट गए रिश्ते बरसों के,
तो अब ताने क्या, तिशने क्या?

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-038

S-071 कुछ तो कमी

कुछ तो कमी रह गई होगी मुहब्बत में,
वरना मजबूरियां किसी को यूं बेवफ़ा नहीं करतीं। 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-071

S-070 मेरी वफ़ा तो

मेरी वफ़ा तो मुझे शायर न बना सकी कभी,
मगर उसकी बेवफ़ाई ने मुकम्मल शायर बना दिया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-070

8.1.22

S-069 ये दुनिया

कभी-कभी ये दुनिया बड़ी खूबसूरत लगती है,
लोग चाहते हैं मुझे भी, जब उन्हें ज़रूरत लगती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-069







5.1.22

G-006 ये दिल उधर ही

याद उसको ही करता रहा हूँ मैं,

बेवफ़ा जिसको कहता रहा हूँ मैं।


ये दिल उधर ही खिंचता गया,

जिधर जाने से रोकता रहा हूँ मैं।


बड़ा कमज़ोर निकला ये दिल,

मज़बूत जिसे समझता रहा हूँ मैं।


आती जाती रहीं बहारें हर सिम्त,

इक मुस्कान को तरसता रहा हूँ मैं।


तमन्नाएं जलके खाक़ भी हो गईं,

फिर भी अबतक सुलगता रहा हूँ मैं।


हर बार उजाड़ा चमन खिज़ाओं ने,

फिर भी बहारों को तकता रहा हूँ मैं।


वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-006

2.1.22

Q-037 शायर की शायरी

शायर की शायरी में तो बड़ा दम था,
पर सुनने वालों के पास भेजा कम था,
दिल की ज़ुबाँ से वास्ता नहीं जिनका, वो
पूछें हैं कश्ती डूबी कैसे पानी जहां कम था।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-037

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...