18.1.22

P-046 वो रिश्ते होते ही

वो रिश्ते होते ही कब हैं, जो बनते ही टूट जाते हैं,
वो तो ख्वाब होते हैं जो नींद खुलते ही टूट जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-046

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...