19.1.22

S-080 कितना भी तंगदस्त

तंगदस्त नहीं है ज़माना, उसके पास ग़मों की बड़ी इफ़रात है।
भूखा न मरने देगा ज़माना मुझे, ग़म खाना ही तो मेरी ख़ुराक़ है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-080

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...