इतनी इज़्ज़त भी न दो किसी को कि हज़्म भी न कर सके उसे,
इतनी ज़्यादा तारीफ़ भी न करो उसकी कि सच ही समझ बैठे उसे।
इतनी ज़्यादा तारीफ़ भी न करो उसकी कि सच ही समझ बैठे उसे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-052
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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