17.1.22

S-079 तंगदिल तो थे

तंगदिल तो थे आप, अब संगदिल क्यों हो गए, 
मेरे मुख़ालिबों की भीड़ में आप शामिल क्यों हो गए।

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-079

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...