भीड़ है बहुत, मगर वीरानी सी छाई है,
लप-लपा रही है लौ, आंधी सी आई है,
बुझना है तो बुझ जा उम्मीदों के चराग़,
थक गया हूँ मैं,मुझेभी नींद सी आई है।
लप-लपा रही है लौ, आंधी सी आई है,
बुझना है तो बुझ जा उम्मीदों के चराग़,
थक गया हूँ मैं,मुझेभी नींद सी आई है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-021
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