24.1.22

K-002 एक गमले में

एक गमले में लगा छोड़े हैं,
मैंने तेरी यादों के पौधे,
रोज़ उन्हें पानी दे देता हूँ
खोल देता हूँ खिड़कियां,
कहीं मुरझा न जाएं वो,
दरीचों के पर्दे हटा देता हूँ।

मेरे बाहर जाने के बाद,

अकेले होते हैं जब यादों के पौधे,

तो रोज़ एक चिरैया आती है,

पौधों के इर्दगिर्द कुछ गाती है,

एकाकीपन कुछ दूर कर जाती है,


वो पौधे हैं अलग किस्म के,

जिनमे फूल नहीं खिलते,

न खिलेंगे, न ही खुशबू देंगे,

हरियाली से ही खुश हो लेता हूँ।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-002


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