याद उसको ही करता रहा हूँ मैं,
बेवफ़ा जिसको कहता रहा हूँ मैं।
ये दिल उधर ही खिंचता गया,
जिधर जाने से रोकता रहा हूँ मैं।
बड़ा कमज़ोर निकला ये दिल,
मज़बूत जिसे समझता रहा हूँ मैं।
आती जाती रहीं बहारें हर सिम्त,
इक मुस्कान को तरसता रहा हूँ मैं।
तमन्नाएं जलके खाक़ भी हो गईं,
फिर भी अबतक सुलगता रहा हूँ मैं।
हर बार उजाड़ा चमन खिज़ाओं ने,
फिर भी बहारों को तकता रहा हूँ मैं।
वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-006
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