काश दुनियां में कोई शख्सियत ऐसी भी होती,
वक़्त के साथ जिसकी फ़ितरत न बदली होती।
वक़्त के साथ जिसकी फ़ितरत न बदली होती।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-044
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment