वक़्त की मानिंद, इंसाँ भी बदलता है,
न वक़्त किसी का, न इंसाँ किसी का है।
न वक़्त किसी का, न इंसाँ किसी का है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-193
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
अच्छे बुरे मौसम गुज़ारे जिस घोंसले में रह कर,
परिंदे छोड़ गए उसे सलाम आख़िरी कह कर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-235
दुनियाँ और कहाँ तक बर्बाद करेगी तुझे "अजनबी"
इश्क़ में तूने ख़ुद ही ख़ुद को कहीं का न छोड़ा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-188
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...