28.2.23

P-193 वक़्त की मानिंद

वक़्त की मानिंद, इंसाँ भी बदलता है,
न वक़्त किसी का, न इंसाँ किसी का है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-193

S-235 अच्छे बुरे मौसम

अच्छे बुरे मौसम गुज़ारे जिस घोंसले में रह कर,

परिंदे छोड़ गए उसे सलाम आख़िरी  कह कर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-235

27.2.23

P-192 रोज़-रोज़ नई तोहमतें

रोज़-रोज़ नई  तोहमतें, नई अदावतें, नई नफ़रतें,
छोटी सी ज़िन्दगी को कितना लंबा समझ रहे हैं लोग।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-192

Q-095 जितनी भी पी लूं

जितनी भी पी लूं तुझे भुलाने को, 
तेरे तसव्वुरात मुझे झूमने नहीं देते।
बड़ा ही दुश्वार है तुझे भूलना यार,
तेरे हमनाम तुझे भूलने नहीं देते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-095


22.2.23

M-050 कब तक रहेगा

कब तक रहेगा बरबाद ऐ दिल,
वक़्त रहते कुछ तो संभल जा।
कब तक रोएगा गुज़रे दौर को,
जहाँ बदला तूभी तो बदल जा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-050

P-191 प्यार पर कोई हक़

प्यार पर दावा-हक़ नहीं होता किसी का,
फिर बेवफ़ाई के वास्ते बहाने क्यों ढूँढना।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-191

21.2.23

P-190 भला क्यों कोई अजनबियों को

भला क्यों अजनबियों को याद रक्खे कोई,
बहुत "अजनबी "आते जाते हैं ज़िन्दगी में। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-190

S-234 कितना अच्छा होता

कितना अच्छा होता अगर यादों पर इंसाँ का कोई कंट्रोल होता।
न होतीं तकलीफें, न होते आंसू, न बेवफ़ाओं का कोई मोल होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-234

P-189 अच्छा होता

अच्छा होता गर यादों पर इंसाँ का कोई कंट्रोल होता,
न होतीं तकलीफें,न ही बेवफ़ाओं का कोई मोल होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-189

20.2.23

Q-094 सुना है दोस्तों के

सुना है दोस्तों के मुझपे इल्ज़ामात बहुत हैं।
ये भी सुना है मेरे अंदाज़ो-नज़रियात ग़लत हैं।
लगाते हैं कैसी कैसी तोहमतें ये सुर्खरू लोग,
बेशऊर बीमार दिमाग़ों की अजीब  फ़ितरत हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-094
                     
 

M-049 बस कुछ ही देर

बस कुछ ही देर तो लगती है,
उड़ती पतंग को ज़मीं पर आने में।
फ़ायदा ही क्या ज़्यादा  उड़ने का,
रक्खा क्या है आसमाँ पे मंडराने में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-049

18.2.23

P-188 दुनियाँ और कहां तक

दुनियाँ और कहाँ तक बर्बाद करेगी तुझे "अजनबी"

इश्क़ में तूने ख़ुद ही ख़ुद को कहीं का न छोड़ा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-188


S-233 कोई शिकायत

कोई शिकायत न रही ज़माने से।
जब से रु-ब-रु हुए हैं  आयने से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-233

17.2.23

G-008 जब कभी वास्ते

जब कभी वास्ते ख़तम होते हैं।
बीच में फ़ासले आरम्भ होते हैं।

मंज़िलें नहीं होतीं मुश्किल,
पहुंचने के रास्ते कम होते हैं।

ग़मों में भी हो चुकी है कशिश, 
आगे आगे ग़म, पीछे हम होते हैं।

ख़ुद को ख़ुद ही संभालो यारों,
ये ज़लज़ले कहाँ कम होते हैं।

रहो उठाते कितनी भी आवाज़,
रोज़मर्रा ही नए सितम होते हैं।

दवाए-ज़ख्म न ढूँढ़ "अजनबी"
अब नए ज़ख्म ही मरहम होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-008

14.2.23

S-232 ग़ुस्से में लौटा दिए

ग़ुस्से में लौटा दिए तमाम तोहफ़े मेरे,
मगर बोसों का हिसाब करना भूल गए। 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-232

13.2.23

Q-093 रात के बाद,

रात के बाद, सुबहा भी ज़रूरी है।
जीने के लिए वजहा भी ज़रूरी है।
ख़ुशी संग कुछ ग़म भी रहें शामिल,
ज़िंदगी में कोई मसला भी ज़रूरी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-093

T-032 शिकायत तो

शिकायत तो ख़ुद ही से है,
ज़िंदगी से भला क्या होगी,
जैसी बनाई वैसी बन गई ज़िंदगी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-032

12.2.23

M-048 तोड़ता जा रहा है

तोड़ता जा रहा है समस्त बंधन,
मन बावरा खोजता है जाने किसे।
उलझन भरा है, एकाग्र नहीं मन,
सीमा में भला कैसे कोई बांधे इसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-048

Q-092 कितने प्यारे, कितने मासूम

कितने प्यारे, कितने मासूम से बन जाते हैं लोग।
जाने कैसे इतना अच्छा नाटक  कर पाते हैं लोग।
वही चेहरा-मोहरा, और वही कद-काठी, 
फिरभी मगर सर से पांव तक बदल जाते हैं लोग।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-092

11.2.23

S-231 क्या करिए अब

क्या करिए अब उन गुज़रे हुए लम्हात की बात,
रक्खे रह गए जब ज़िन्दगी के सब ही तजुर्बात।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-231
  

P-187 ये तो मन का भ्रम

ये तो मन का भ्रम है कि रिश्ते टूट जाते हैं तोड़ देने से।
रिश्ते तो वो हैं, जो कभी टूटते नहीं दुनियाँ छोड़ देने से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-187

9.2.23

S-230 उड़ाता रहा मेरी नींद

उड़ाता रहा मेरी नींद ता-उम्र जो शख्स,
वो आया मुझे जगाने मेरे सो जाने के बाद।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-230

P-186 ऐ अंधेरों, मैं

ऐ अंधेरों, वाकिफ़ हूँ तुमसे,रोज़ मुंह उठाए चले आते हो।
बिगाड़ न पाते तुम कुछ, सुबह मुंह लटकाए चले जाते हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-186

8.2.23

S-229 शाइस्तगी-पाकीज़गी

शाइस्तगी-पाकीज़गी ख़त्म, अब महज़ रस्मों-रिवाज रह गए,
जज़्बात-एहसासात ग़ायब हुए, बेमहक ख़ारज़ार गुलाब रह गए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-229
   

7.2.23

S-228 ख़्वाब पूरे होते नहीं,

ख़्वाब पूरे होते नहीं, फिरभी तुझे ख़्वाबों में सजा रक्खा है।
हक़ीक़त जानके भी, दिल को मैंने मुग़ालते में लगा रखा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-228

S-227 कुछ दिलकश यादें

कुछ दिलकश यादें देदे मुझे वक़्ते-तन्हाई बिताने को।
मैं भी तो कभी याद कर सकूं अपने गुज़रे ज़माने को।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-227

S-226 मुद्दत गुज़री,

मुद्दत गुज़री, नहीं कोई इम्कान उसके आने का,
फिर भी क्यों जुनूँ है मुझे राहों में आंखें बिछाने का। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-226

G-008 फूल खिला भी,

फूल खिला भी, और जल्द ज़र्द हो गया।
धूप निकली भी, पर मौसम सर्द हो गया।

जब-जब आये राहतों के हल्के से झोंके,
एक टीस उठी, दिल में नया दर्द हो गया।

ग़मों से बैर करके जब भी आईं ख़ुशियां,
हर बार लगा मुझ पर एक कर्ज़ हो गया।

बस उसी बेवफ़ा ने न छोड़ी ज़िद अपनी,
कैफ़ियत पे मेरी सारा शहर हमदर्द हो गया।

पहले होता था इख़्तिलाफ़, तो मान जाते थे,
अब मुसलसल अदावत है, ये फ़र्क़ हो गया।

मंज़िल से पेश्तर साथ छूटने का ग़म तो  है,
मलाल ये भी कि सफ़र, सफ़रे-ग़र्द हो गया।

हुस्न वालों की तो अदा ठहरी बदल जाना,
पर "अजनबी" भला कैसे कमज़र्फ़ हो गया।
     -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-008-

Q-091 दर्द-ए-दिल छुपाए

दर्द-ए-दिल छुपाए न छुपते कभी,
अगर ये आंसू रंगीन हुआ करते।
बड़ी रुसवाईयाँ हो जाया करतीं,
जहाँ वाले तमाशबीन हुआ करते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-091

S-225 हुस्न-ओ-जमाल

हुस्नो-ओ-जमाल ही दौलत नहीं होते,
जज़्बातो-ख़्यालात भी हुआ करते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3.2.23

Q-090 मुझे ग़म नहीं

मुझे ग़म नहीं अपने टूट जाने का,
सितारे भी कभी कभी टूट जाते हैं।
इतना परेशाँ क्यों है तू "अजनबी",
अपने भी कभी कभी रूठ जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-090

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...