फूल खिला भी, और जल्द ज़र्द हो गया।
धूप निकली भी, पर मौसम सर्द हो गया।
धूप निकली भी, पर मौसम सर्द हो गया।
जब-जब आये राहतों के हल्के से झोंके,
एक टीस उठी, दिल में नया दर्द हो गया।
ग़मों से बैर करके जब भी आईं ख़ुशियां,
हर बार लगा मुझ पर एक कर्ज़ हो गया।
बस उसी बेवफ़ा ने न छोड़ी ज़िद अपनी,
कैफ़ियत पे मेरी सारा शहर हमदर्द हो गया।
पहले होता था इख़्तिलाफ़, तो मान जाते थे,
अब मुसलसल अदावत है, ये फ़र्क़ हो गया।
मंज़िल से पेश्तर साथ छूटने का ग़म तो है,
मलाल ये भी कि सफ़र, सफ़रे-ग़र्द हो गया।
हुस्न वालों की तो अदा ठहरी बदल जाना,
पर "अजनबी" भला कैसे कमज़र्फ़ हो गया।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-008-
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